ट्रम्प प्रशासन का हाल यह है कि वह आंतरिक और विदेशी दोनों ही मंचों पर बहुत बुरी तरह नाकाम हो चुका है। आंतरिक मंच का यह हाल है कि कोरोना से 82 हज़ार से अधिक मौतें हो चुकी हैं और सक्रमितों की संख्या 14 लाख को पार कर चुकी है, बेरोज़गारों की संख्या बढ़कर 5 करोड़ हो चुकी है। विदेशी नीति के स्तर पर देखा जाए तो चीन की आर्थिक, सामरिक और मेडिकल ताक़त बहुत तेज़ी से ऊंचाइयों की ओर बढ़ रही है। रूस और चीन मिलकर ईरान पर हथियारों के प्रतिबंधों की समय सीमा में विस्तार करने के अमरीकी प्रस्ताव को वीटो करने के लिए तैयार हो गए हैं, इससे पहले केमिकल हथियारों के इस्तेमाल के आरोप के मामले में सीरिया के ख़िलाफ़ निंदा प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में पास करवाने में भी अमरीका नाकाम हो गया।
ट्रम्प इस समय अमरीकी जनता के बीच और पूरी दुनिया में एक मज़ाक़ बनकर रह गए हैं जिन्होंने यह मशविरा दे डाला था कि कोरोना का इलाज करने के लिए डेटाल जैसे एंटी बायोटिक लिक्विड पीनी चाहिए, जिन्होंने प्रेस कान्फ़्रेन्स में चीनी मूल की पत्रकार के साथ बेहद घटिया बर्ताव किया।
इन हालात में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो यह कहने के लिए इस्राईल गए कि अमरीका वेस्ट बैंक का एक तिहाई भाग इस्राईल में शामिल किए जाने का समर्थन करेगा, मगर इन हरकतों से ट्रम्प को चुनाव जीतने में कोई मदद नहीं मिल सकेगी। इस घटना के बाद फ़िलिस्तीनी जनता का इंतेफ़ाज़ा आंदोलन शुरू हो गया है। फ़िलिस्तीनी जियालों ने साबित कर दिया कि उनके हाथ का पत्थर किसी बंदूक़ से कम नहीं है।
पोम्पेयो को अच्छी तरह पता है कि दो तुरुप के पत्ते हैं जिनकी मदद से ट्रम्प आगामी चुनाव जीत सकते हैं और हर मंच पर मिलने वाली नाकामी से जनता का ध्यान हट सकता है।
पहली चीज़ है वेस्ट बैंक के इलाक़े को आनन फ़ानन में इस्राईल में शामिल करवाना ताकि अमरीका में यहूदी लाबी का भरपूर समर्थन हासिल हो जाए।
दूसरी चीज़ है ईरान के ख़िलाफ़ सीमित युद्ध जिससे अमरीका का ध्वस्त हो चुका वर्चस्व बहाल हो जाए। ईरानियों ने आधुनिक अमरीकी ड्रोन गिराकर और अमरीका की एनुल असद छावनी पर मिसाइलों की बरसात करके अमरीका की हवा निकाल दी है।
इस बार फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में इंतेफ़ाज़ा का ज्वालामुखी फट पड़ा तो इस्राईल के किसी कोने में शांति नहीं रहेगी। आज तो फ़िलिस्तीनी युवा ने पत्थर से इस्राईली सैनिक की जान ली है, कल यहूदी बस्तियों पर मिसाइल गिरेंगे।
कोरोना महामारी के दौर में पहले इस्राईली सैनिक की मौत नेतनयाहू और ट्रम्प दोनों के लिए पैग़ाम है कि वह वेस्ट बैंक के इलाक़ों को इस्राईल में मिलाएं या न मिलाएं उनका अंजाम यही होना है।
नेतनयाहू को भी उसी तरह पछताने पर मजबूर होना पड़ेगा जिस तरह लेबनान में भारी पराजय के बाद ओलमर्ट और बाराक को पछताना पड़ा था। ट्रम्प को भी उसी तरह पछताना पड़ेगा जिस तरह बुश को इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में पछताना पड़ा था। यह सब इतिहास के कूड़ेदान में गुम हो जाएंगे जबकि प्रतिरोध अमर रहेगा और उसी तरह विजय हासिल करेगा जिस तरह इतिहास में प्रतिरोध को विजय मिलती रही है।
अब्दुल बारी अतवान
अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार